हरियाणा सरकार ने राज्य में 50 गज और 100 गज के प्लॉट खरीदने पर स्टांप ड्यूटी पूरी तरह समाप्त कर दी है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने बुधवार को विधानसभा में विपक्ष की ओर से उठाए गए ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर जवाब देते हुए इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि यह कदम सरकार के पारदर्शी लेन-देन, सुशासन को बढ़ावा देने, काले धन पर रोक लगाने और जनता को वास्तविक व उचित दरों पर संपत्ति खरीदने का अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उठाया गया है।
सैनी ने कहा, “आज से इन प्लॉट्स पर स्टांप ड्यूटी शून्य कर दी गई है।” यह आदेश प्रधानमंत्री आवास योजना, मुख्यमंत्री शहरी आवास योजना और मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना के अंतर्गत खरीदी गई संपत्तियों पर लागू होगा।
मुख्यमंत्री ने बताया कि कलेक्टर रेट वह न्यूनतम मूल्य होता है जिस पर किसी संपत्ति का पंजीकरण सरकारी रिकॉर्ड में किया जाता है। संपत्ति खरीदते समय पंजीकरण शुल्क और स्टांप ड्यूटी इन्हीं दरों पर आधारित होती है।
उन्होंने जानकारी दी कि पूरे राज्य में कुल 2,46,812 खंडों में से 72.01% हिस्सों में कलेक्टर रेट केवल 10% बढ़ाया गया है। यह पूरा प्रोसेस डेटा-आधारित और तार्किक फार्मूले पर आधारित है, जिसके तहत प्रत्येक खंड में शीर्ष 50% रजिस्ट्री का विश्लेषण किया गया। जहां रजिस्ट्री का मूल्य कलेक्टर रेट से 200% अधिक था, वहां अधिकतम 50% तक वृद्धि की गई।
इसके बावजूद, अधिकतर इलाकों में कलेक्टर रेट वास्तविक बाजार भाव से काफी कम हैं।
विपक्षी विधायक आदित्य देवी लाल ने कहा कि बढ़े हुए कलेक्टर रेट से जनता में गहरा रोष है और आम लोगों के लिए घर खरीदना मुश्किल हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार छोटे व्यापारियों, किसानों और गरीबों पर बोझ डाल रही है और इसे वापस लिया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने पलटवार करते हुए कहा कि 2004 से 2014 के दौरान कांग्रेस शासनकाल में कलेक्टर रेट 10% से 300% तक बढ़ाए गए थे, जबकि भाजपा सरकार के कार्यकाल (2014 से 2025) में यह वृद्धि औसतन सिर्फ 9.69% रही है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार ने कोई नया पंजीकरण कर नहीं लगाया है। 2008 से अब तक पुरुषों पर 7% (जिसमें 2% विकास शुल्क शामिल है) और महिलाओं पर 5% स्टांप ड्यूटी लागू है, जो यथावत है।
सैनी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस शासनकाल में बिना किसी फार्मूले के कलेक्टर रेट बढ़ाए जाते थे, जिससे बिल्डरों और भू-माफिया को फायदा पहुंचता था। उन्होंने उदाहरण दिए कि फरीदाबाद में दरें 2008 में 300% और 2011-12 में 220% बढ़ीं, करनाल में 2012-13 में 220%, महेंद्रगढ़ में 2010-11 और 2011-12 में 100%, और झज्जर में 2007-08 में 109% की वृद्धि की गई थी।