हिसार/हांसी: हरियाणा मानवाधिकार आयोग (HHRC) ने हांसी में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दो श्रमिकों की मौत के मामले में नगर निकायों और पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराज़गी जताई है। आयोग ने कहा है कि जांच में लापरवाही न केवल संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा असुरक्षित मैनुअल सीवर सफाई पर लगाए गए प्रतिबंधों की खुली अवहेलना भी है।
17 दिसंबर 2025 को पारित अपने आदेश में आयोग ने कहा कि यह घटना दर्शाती है कि संबंधित अधिकारी अब भी सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों को लागू करने में विफल रहे हैं, जिनके तहत बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर और सेप्टिक टैंक में मैनुअल प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है।
मामला और आयोग की स्वतः संज्ञान कार्रवाई
यह मामला अक्टूबर 2025 का है, जब आरोप है कि एक होटल के सेप्टिक टैंक में बिना किसी सुरक्षा उपकरण के दो श्रमिकों को उतारा गया, जहां दम घुटने से उनकी मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने इस घटना का स्वतः संज्ञान लिया।
आयोग की कड़ी टिप्पणियां
आयोग की पूर्ण पीठ—जिसमें अध्यक्ष न्यायमूर्ति ललित बत्रा तथा सदस्य कुलदीप जैन और दीप भाटिया शामिल हैं—ने कहा कि सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बावजूद ऐसे हादसे लगातार सामने आ रहे हैं। इस फैसले में बिना यांत्रिक साधनों और पर्याप्त सुरक्षा उपायों के मैनुअल सीवर सफाई पर पूरी तरह रोक लगाई गई है।
आयोग ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले को “दबने” नहीं देगा और मौतों के लिए जिम्मेदारी तय की जाएगी।
हालांकि 19 अक्टूबर 2025 को एफआईआर दर्ज की गई थी, लेकिन आयोग ने पाया कि जांच अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ी। हांसी के पुलिस अधीक्षक द्वारा दी गई स्थिति रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए आयोग ने कहा कि उसमें जिम्मेदारी तय करने को लेकर “चौंकाने वाली चुप्पी” है, जबकि जिला अटॉर्नी पहले ही संज्ञेय अपराध बनता होने की राय दे चुके हैं।
आयोग ने कहा, “मानव जीवन की हानि और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामले में जांच एजेंसी का यह ढुलमुल रवैया बेहद चिंताजनक है।”
अधिकारियों को तलब, कई रिपोर्टें तलब
मामले की धीमी प्रगति पर सख्त रुख अपनाते हुए आयोग ने जांच अधिकारी और डीएसपी (क्राइम), हांसी को पूरे केस रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है।
इसके साथ ही, आयोग ने छह सप्ताह के भीतर विभिन्न अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है—
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उपायुक्त को मृतक श्रमिकों के परिजनों को दी गई या स्वीकृत मुआवजा राशि, अंतरिम सहायता और आश्रितों के पुनर्वास उपायों पर रिपोर्ट देने को कहा गया है।
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नगर परिषद या ग्राम पंचायत रामपुरा को होटल के लाइसेंस, निरीक्षण स्थिति, घटना के कारणों और 2013 के मैनुअल स्कैवेंजिंग निषेध कानून के उल्लंघन पर रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
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होटल प्रबंधन को सेप्टिक और सीवर टैंकों में असुरक्षित मैनुअल प्रवेश रोकने, सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता, गैस परीक्षण, बचाव व्यवस्था, ऑक्सीजन सिलेंडर और मास्क, तथा यंत्रीकरण की प्रगति पर अनुपालन रिपोर्ट देनी होगी।
आयोग ने पुलिस अधीक्षक को भी जांच की व्यक्तिगत निगरानी करने और 15 जनवरी से एक सप्ताह पहले कार्रवाई रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया है।
मैनुअल स्कैवेंजिंग पर व्यापक चिंता
आयोग ने कहा कि हांसी की घटना यह दिखाती है कि वैधानिक प्रतिबंधों और बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप के बावजूद मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसी अमानवीय प्रथाएं जारी हैं। 2013 के कानून के तहत बिना सुरक्षा उपकरण और यांत्रिक सहायता के सीवर या सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई कराना आपराधिक अपराध है।
आयोग ने दोहराया कि बिना सुरक्षा उपकरण के श्रमिकों को संकुचित स्थानों में उतारना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि मानवीय गरिमा पर भी सीधा आघात है।
आगे की कार्रवाई
आयोग ने साफ कर दिया है कि अगली सुनवाई में केवल औपचारिक अनुपालन नहीं, बल्कि ठोस नतीजों की समीक्षा होगी। इसमें यह देखा जाएगा कि—
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क्या आपराधिक जिम्मेदारी सही ढंग से तय की गई है,
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क्या पीड़ित परिवारों को समय पर और पर्याप्त मुआवजा मिला है, और
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भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए क्या प्रणालीगत कदम उठाए गए हैं।
आयोग ने कहा कि ये मौतें कोई “दुर्घटना” नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता का नतीजा हैं। मामला अब 15 जनवरी को फिर से सुना जाएगा, जब जिला प्रशासन, पुलिस और होटल प्रबंधन की रिपोर्टों की समीक्षा की जाएगी।