तिमारपुर विधानसभा ढका गांव में स्थित हरिजन सेवक संघ, गांधी आश्रम में स्थित छात्रावास में रहने वाली छात्राओं को बिना किसी नोटिस दिए, बाहर निकाला गया।
छात्राओं के साथ हुई इस अमानवीय घटना के बाद हरिजन सेवक संघ में रहने वाली दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा प्रियंका कश्यप व अन्य छात्राओं ने गांधी आश्रम प्रबंधन कमेटी पर गंभीर सवाल खड़े किए और बताया कि कोरोना महामारी के समय गांधी आश्रम प्रबंधन अधिकारीयों ने उन्हें अपने घर जाने के कहा साथ ही उनसे कहा गया कि जब हालात सामान्य हो जाएं तो वापस आ जाना। आश्रम प्रबंधन द्वारा घर जाने की बात को मानते हुए वहां रह रही छात्राओं ने अपना जरूरी सामान लिया और अपने घर के चली गई। प्रतियोगिता परीक्षाओं का समय करीब आ रहा था साथ ही दिल्ली में कोरोना महामारी के नियंत्रण में होता देख छात्राओं ने दिल्ली वापसी की लेकिन हरिजन सेवक संघ के पदाधिकारियों ने उन्हें आश्रम में प्रवेश करने के लिए साफ मना कर दिया और पुलिस की मदद से छात्राओं को वहां से चले जाने के लिए डराया व धमकाया गया।
पीड़ित छात्राओं ने बताया कि यह संस्था हरिजन सेवक संघ जो गांधी जी ने स्वंय स्थापित की थी उसका मुख्य उद्देश्य था कि समाज का कल्याण किया जाए लेकिन आज यहां के जो पदाधिकारी हैं वह अपने मुनाफे के लिए इस परिसर में जितनी भी बिल्डिंग है उन सभी को प्राइवेटाइज कर रहे हैं और समाज कल्याण के नाम पर अलग-अलग मिनिस्ट्री से विदेशों से चैरिटी फंड को रिसीव करते हैं और उसे कहीं भी किसी भी तरह से सोशल वेलफेयर में नहीं लगाते।
इस कैंपस के अंदर कक्षा 5 तक के बच्चों के लिए स्कूल है थक्करबापा स्कूल के नाम से और उनका आवास भी है। लेकिन वहां की स्थिति इतनी दयनीय है कि वहां उन को टॉयलेट जाने के लिए भी टॉयलेट सीट्स उपलब्ध नहीं है। स्कूल में पढ़ने वाले छोटे बच्चों को अव्यवस्थित तरीके से रखा हुआ है साथ ही सफाई के नाम पर वहां रोज झाड़ू भी नहीं लगती।
यह ठक्कर बाप्पा छात्रावास और स्कूल मूलतः हरिजन बच्चों के लिए शुरू किया गया था और उन्हीं के लिए यहां छात्रावास भी बनाया गया था लेकिन आज इस स्कूल और छात्रावास ने हरिजन बच्चों की संख्या सबसे कम पाई जा रही है। उनको सिक्योरिटी भी नहीं दी जाती है ताकि उनकी देखरेख करने वाला कोई हो जिससे कि बच्चे ना भागे या बच्चे कहीं और गायब ना हो।
यहां हरिजन बच्चों को रखा तो जाता है लेकिन उनसे भी फीस वसूली जाती हैं उनके माता-पिता को बोला जाता है कि आप अपने बच्चों के कपड़े खुद लेकर आए हैं सारा सामान महीने पर दीजिए और फीस भी जबकि छात्रावास के जो उद्देश्य है उनके अनुसार बच्चों को बिना कोई फीस लिए रखा जाना चाहिए।
इस पूरे मामले की जानकारी तिमारपुर विधानसभा से पूर्व आप विधायक पंकज पुष्कर के पास पहुंची और उन्होंने अपने माध्यम से पीड़ित छात्राओं की हर संभव मदद की बात करते हुए हरिजन सेवक संघ, दिल्ली में अनियमितताओं पर बयान दर्ज कराते हुए कहा कि :-
मैं जानता हूं इस समय हास्टल की छात्राएं बहुत दिक्कत में होंगी। उन्हें अपने हॉस्टल के रूम में प्रवेश करने तक नहीं दिया जा रहा। मैं नहीं जानता कि इस मुश्किल स्थिति में वे क्या प्रयास कर सकती हैं।
ऐसी स्थिति में मेरा अनुरोध है कि समाज के सभी जिम्मेदार लोग, मीडिया और प्रशासन के लोग इस महत्वपूर्ण मामले में अपनी भूमिका का निर्वाह करें। संभव हो तो मेरी तरफ से निम्न अनुरोध हैं।
१) हरिजन सेवक संघ के छात्रावास की एक बिल्डिंग पिछले वर्ष छात्राओं से खाली करवा ली गई। ऐसा जबरदस्ती हुआ। यह उनकी मर्जी के बिना हुआ। यह एक बिल्डिंग महिंद्रा टेक नामक एक निजी संस्थान को दे दी गई है। क्या यह सच है? इस बारे में आपको क्या जानकारी है? यह लिखिएगा, खोजिएगा।
२) हरिजन सेवक संघ परिसर बहुत विशाल है। इस जमीन को तिमारपुर क्षेत्र के ढका गांव के लोगों ने कौड़ियों के दाम पर दिया था। स्थानीय समाज का मानना था कि गसमें समाज के वंचित वर्गों की बेहतरी के लिए, समर्पित तरीके से काम होगा। क्या ऐसा हो रहा है? अगर हां तो कैसे और नहीं तो कैसे?
३) वहां क्या-क्या गतिविधियां ऐसी हो रही हैं जो केवल कुछ लोगों के निजी स्वार्थों के लिए हैं?
४) क्या क्या काम ऐसे चल रहे हैं जिसके पीछे व्यवसायिक लेन देन है?
५) क्या-क्या काम ऐसे हैं जोकि समाज के सभी वर्गों के हित के लिए हैं और क्या-क्या काम ऐसे हैं जो केवल दलित वर्ग के हित के लिए हैं?
मेरे 5 वर्ष के विधायक के कार्यकाल में हरिजन सेवक संघ के अंदर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की शिकायतें मेरी जानकारी में आईं थीं। मैंने हरिजन सेवक संघ मैनेजमेंट के डॉ शंकर सान्याल और रजनीश कुमार जी से बात की। मैंने हर संभव कोशिश की कि इस संस्था में सुधार, पारदर्शिता और जनहित को सुनिश्चित और सर्वोच्च किया जाए। लेकिन मैनेजमेंट की कोशिश रहती थी कि हरिजन सेवक संघ का संचालन अपारदर्शी तरीके से हो, इसमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व कम से कम हो और इसको एक निजी संस्था के तरीके से चलाया जाए।
इस मामले में सभी को यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह संस्था गैर-सरकारी जरूर है लेकिन गैर-सामाजिक नहीं है। यह संस्था जिस जमीन पर खड़ी है क्या वह स्थानीय समाज की लगभग मुफ्त में दी गई जमीन नहीं है? क्या इस संस्था के विकास में हजारों लोगों का श्रम और आर्थिक सहयोग नहीं लगा है?
क्या इस संस्था के बनने के पीछे भारत की अनुसूचित जातियों के प्रति होने वाला ऐतिहासिक अन्याय का मुद्दा नहीं है? क्या इस संस्था का कारण गांधीजी और डॉक्टर अंबेडकर के बीच का ऐतिहासिक संवाद नहीं है? इस संवाद के बाद 1932 में पूना पैक्ट हुआ। उससे इस संस्था का जन्म हुआ।
इस संस्था के पीछे सोच यह थी कि सवर्ण समाज के लोग छुआछूत और जातिगत भेदभाव का प्रायश्चित करेंगे। गांधीजी और कस्तूरबा ने गांव के लोगों के साथ मिलकर सवर्ण लोगों के आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए अपने हाथ से नालियां साफ की हैं, मानव मल को उठाया है।
क्या यह संस्था इसलिए बनी थी कि इस संस्था को कुछ लोग अपनी निजी जागीर बना लें? क्या गांधी जी के नाम से बनी संस्था को अपारदर्शी और भ्रष्ट तरीके से चलाने की अनुमति हो सकती है? यह संस्था इसलिए बनी थी कि सवर्ण समाज के लोग अपना जातिगत अहंकार और स्वार्थ पूरी तरह से छोड़कर अधिकतम संभव सच्चाई के साथ इस देश के वंचित वर्गों के लिए समर्पण का हर संभव प्रयास करें। क्या इस संस्था में निस्वार्थ और समर्पित भाव से काम हो रहा है या …?
इस संस्था को चलाने और सुधारने का सबसे पहला अधिकार स्थानीय समाज और खास तौर से दलित और वंचित वर्ग का है। इस वर्ग के वरिष्ठ और युवा लोगों का है। इस संस्था में समर्पित सहयोग करने का काम सवर्ण समाज के उन लोगों को करना होगा जिन्होंने स्वयं को जातिगत अहंकार और स्वार्थ से पूरी तरह मुक्त कर लिया है। लेकिन ध्यान रखें कि सहयोग और सेवा के नाम पर इस संस्था और इस संस्था की जमीन पर नियंत्रण करने की कोशिश गांधी जी की विरासत के प्रति सबसे बड़ा विश्वासघात होगा। यह भारत के संविधान की भावना का भी उल्लंघन होगा।
देश में गांधी जी और डॉक्टर अंबेडकर के विचारों को वर्तमान संदर्भ में समझने वाले सभी नागरिकों और कार्यकर्ताओं को इस संस्था को आगे बढ़ाने का मार्गदर्शन करना होगा। वे अपनी जिम्मेदारी से बचेंगे तो वे गांधी जी और बाबासाहेब अंबेडकर की परंपरा के साथ अन्याय करेंगे।
इस संस्था को शत-प्रतिशत पारदर्शी तरीके से, बिल्कुल न्यायसम्मत सामाजिक भागीदारी के साथ, वंचित समाज के सर्वाधिक विकास के लिए चलाया जाना चाहिएं। इस अत्यधिक महत्वपूर्ण संस्था को किन्हीं दो-तीन लोगों की मर्जी पर नहीं छोड़ा जा सकता।
गांधी जी और डॉक्टर अंबेडकर जी की परंपरा से जुड़े सभी लोगों से और समाज के सभी लोकतांत्रिक लोगों से मेरी अपील है कि इस ऐतिहासिक संस्था को कुछ लोगों की निजी जागीर बनने से रोका जाए। हर गांधीवादी और अंबेडकरवादी से मेरा अनुरोध है कि बिना किसी राग-द्वेष के, बिना व्यक्तिगत लाभ-हानि के गांधी-अंबेडकर संवाद के सर्वोच्च उद्देश्यों और भारत के संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखकर हरिजन सेवक संघ नामक इस संस्था का रूपांतरण और संचालन करें।